Mother’s Day : आज की ‘मॉम’ बच्चों को कैसे सिखा रहीं बचत की ABCD, किन बातों पर रहता है जोर?

Mother’s Day  : माँ सिर्फ बच्चों की देखभाल और संस्कार देने तक सीमित नहीं रह गई हैं। बदलते समय के साथ वे अब घर की वित्तीय योजना में भी उतनी ही सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। खासकर नई पीढ़ी की माताएं सोशल मीडिया के जरिए फाइनेंशियल लिटरेसी को बढ़ावा दे रही हैं और न केवल खुद आर्थिक रूप से जागरूक हो रही हैं, बल्कि अपने बच्चों को भी जिम्मेदार फाइनेंशियल नागरिक बनाने की दिशा में काम कर रही हैं।

फाइनेंशियल जागरूकता की नई शुरुआत

कोविड काल के बाद से कई माताएं, विशेषकर शहरी क्षेत्रों में रहने वाली महिलाएं, न सिर्फ पारिवारिक खर्च बल्कि निवेश, टैक्स और इमरजेंसी फंड जैसी बातों पर भी ध्यान देने लगी हैं। सिलीगुड़ी की अनुशिखा बंसल, जो एक एजुकेशनल कंटेंट क्रिएटर हैं, बताती हैं कि उन्होंने बेटे की उच्च शिक्षा के लिए एक विशेष सेविंग्स प्लान तैयार किया है, ताकि भविष्य की बढ़ती लागत के बोझ से समय रहते निपटा जा सके।

बजट प्लानिंग और खर्चों पर नियंत्रण

मुंबई की अवंतिका बहुगुणा, जो एक सफल महिला उद्यमी हैं, ने पहले जहां टैक्स से जुड़े मामलों को किसी और के भरोसे छोड़ दिया था, वहीं अब वे खुद प्रोफेशनल सलाह लेकर फैसले लेती हैं। असम की रूपल बजाज हर छोटे-बड़े मौके के लिए अलग बजट तय करती हैं, चाहे वह जन्मदिन हो या कोई पारिवारिक आयोजन।

अनुशिखा ने UPI ट्रांजैक्शन के लिए अलग बैंक खाता बनाया है जिसमें मासिक लिमिट तय होती है। यह तरीका उन्हें ऑनलाइन खर्चों पर लगाम लगाने में मदद करता है।

इमरजेंसी फंड: एक अनदेखी ज़रूरत

फाइनेंशियल सलाहकारों की मानें तो कम से कम 3-6 महीने के खर्चों को कवर करने वाला इमरजेंसी फंड हर परिवार के पास होना चाहिए। इसमें किराया, EMI, बच्चों की स्कूल फीस और दवाइयों जैसी आवश्यक चीज़ें शामिल होती हैं। बंसल और बहुगुणा दोनों ने ऐसे फंड तैयार कर रखे हैं जिन्हें केवल ज़रूरत के समय ही उपयोग में लाया जाता है।

साझेदारी में फैसले, पारदर्शिता में विश्वास

रूपल बजाज अपने पति के साथ मिलकर निवेश योजनाएं बनाती हैं। उनका मानना है कि परिवार के हर सदस्य को यह पता होना चाहिए कि पैसा कहां और कैसे लगाया जा रहा है। वे म्यूचुअल फंड में SIP और फिक्स्ड डिपॉजिट जैसी योजनाओं को प्राथमिकता देती हैं। अनुशिखा भी लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म गोल्स के आधार पर निवेश करती हैं, जिससे जोखिम संतुलित रह सके।

बच्चों को सिखा रही हैं पैसे की समझ

आज की माँ बच्चों को फाइनेंशियल लिटरेसी की शुरुआत छोटी उम्र से ही सिखा रही हैं। सात साल के बेटे को पॉकेट मनी देना और उससे खर्च का हिसाब बनवाना एक रोचक और असरदार तरीका है, जिसे अनुशिखा अपनाती हैं। वहीं बहुगुणा की बेटी ने महज़ पाँच साल की उम्र में इमरजेंसी फंड बनाना शुरू कर दिया था। बजाज अपने चार साल के बेटे को गुल्लक से बचत करना सिखा रही हैं और उसके लिए सरल वित्तीय किताबें भी पढ़ा रही हैं।

भावनात्मक खर्च और उससे जुड़े खतरे

रूपल बजाज स्वीकार करती हैं कि कई बार माताएं भावनात्मक रूप से बहककर जरूरत से ज्यादा खर्च कर बैठती हैं—जैसे महंगे गिफ्ट्स, ब्रांडेड कपड़े या बेवजह की कोचिंग। इससे पारिवारिक बजट डगमगा सकता है। फाइनेंशियल एक्सपर्ट मयंक भटनागर मानते हैं कि इमरजेंसी फंड के बाद माता-पिता को बच्चों की शिक्षा और अपनी रिटायरमेंट की प्लानिंग को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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